मेरे लब्जों को क्या समझेंगे |
बचते रहे उम्र भर साये से मेरे,
मेरे जख्मों को क्या समझेंगे |
भूल जाना यूँ तो नहीं है, रवायत मोहब्बत की |
समझे नहीं जो हालात मेरे,
इन रस्मों को क्या समझेंगे |
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जो साथ चल रहा साथी है बाकि सारे किस्से हैं
चित्त वायु वेग सा चंचल है भ्रमित करे जो पल पल है
मन को साधे साधू है अधखुले तो दल दल है
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समय बदल जाये चाहे पर बदल ना मन तो पाता है.
पल का सारा सार ना जाने, कैसे यूँ खो जाता है,
अंखियों ने देखे जो सपने हो ना पाते वो अपने
आकर पल ना जाने पल में कैसा क्या बो जाता है,
पीर बने प्रहरी पल की रहे सुहागिन सी मन में,
संबल मन का ना जाने कैसे,क्या दे पल को जाता है
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